Thursday, 23 May 2019

मशीनों का शहर...

मशीनों का शहर...
शहर तेरी गली में
कुत्तो का बवाल है..
मैं हैरान हूं देखकर
पत्थर का अकाल है..!!
फैली हुई शाखाएं
पेड़ तो बड़ा घना है..
पर पहरे पे बैठा उल्लू
पंछी को आना मना है..!!
ऊंचे मकानों के भी
कद कितने छोटे है..
कितने मजबूर बेघर
फ़ुटपाथ पर ही सोते है..!!
आदमियों के इस भीड़ में
इंसान लापता है..
मशीनों का यह शहर
जाने कब सोता है..!!
शहर तेरी गली में
अब मुझे ना रहना है..
दम घुटता जा रहा है
वापस गाँव जाना है..!!
***सुनिल पवार...✍️

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